भारतीय संविधान की विशेषताएं: UPSC 2026 | Prelims and Mains Free Notes
भारतीय संविधान की विशेषताएं जानें – संघवाद, संसदीय प्रणाली, मूल अधिकार व नवीनतम संशोधन। UPSC 2026 Prelims and Mains Free Notes
POLITY
Md Afjal Ansari
5/5/20261 min read


स्रोतों की सूची
भारत का संविधान (मूल पाठ एवं वर्तमान संशोधन)
M. Laxmikant – ‘भारतीय राजनीति’ (नवीनतम संस्करण 2026)
NCERT – ‘भारतीय संविधान का परिचय’ (कक्षा 11, 2024-25 संस्करण)
NITI Aayog रिपोर्ट 2026 – ‘संविधान के 75 वर्ष: उपलब्धियाँ एवं चुनौतियाँ’
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (Economic Survey 2025-26) – अध्याय 10: शासन एवं संवैधानिक संस्थाएँ
सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय (2024-2026) – ‘शबाना फातिमा बनाम यूपी सरकार’ एवं ‘इलेक्टोरल बॉन्ड याचिका’
यूपीएससी (UPSC) वार्षिक रिपोर्ट 2026 – पाठ्यक्रम एवं परीक्षा पैटर्न
परिचय
प्रिय छात्र, यूपीएससी (UPSC) की तैयारी में ‘भारतीय संविधान की विशेषताएं’ एक ऐसा आधारस्तंभ है, जिसे गहराई से समझे बिना सिविल सेवा परीक्षा में सफलता पाना लगभग असंभव है। यह विषय न केवल प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में बार-बार दोहराया जाता है, बल्कि मुख्य परीक्षा (Mains) के जीएस-II पेपर और साक्षात्कार (Interview) में भी इससे जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। यदि आप हिंदी माध्यम के विद्यार्थी हैं, तो इन विशेषताओं को सरल, उदाहरण-प्रधान और तकनीकी दृष्टि से समझना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय संविधान को बनाने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा था, लेकिन आज 2026 में यह दस्तावेज़ 75 से अधिक वर्षों का अनुभव समेटे हुए है। 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण और NITI Aayog की रिपोर्टों के अनुसार, समय के साथ संविधान ने जिस लचीलेपन और अनुकूलनशीलता का परिचय दिया है, वही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इस लेख में हम भारतीय संविधान की विशेषताओं का विश्लेषण करेंगे – ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर 2026 तक के नवीनतम संशोधनों और न्यायिक व्याख्याओं तक। साथ ही, हम यूपीएससी के लिए अभ्यास-उपयोगी दृष्टिकोण भी अपनाएंगे।
परिभाषा
भारतीय संविधान की विशेषताएं (Features of Indian Constitution) उन मूलभूत तत्वों, संरचनात्मक सिद्धांतों और व्यवस्थाओं का समूह है, जो भारत के संविधान को विश्व के अन्य संविधानों से अलग और अद्वितीय बनाते हैं। ये विशेषताएं संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, नीति निर्देशक तत्त्व, संघीय ढाँचे से लेकर संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका, एकल नागरिकता, आपातकालीन प्रावधान, संशोधन प्रक्रिया, धर्मनिरपेक्षता, समाजवादी स्वरूप आदि को शामिल करती हैं। परीक्षा की दृष्टि से ये वे कसौटियाँ हैं जिनसे आप संविधान की ‘प्रकृति’ और ‘कार्यप्रणाली’ को परख सकते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
भारतीय संविधान का निर्माण 1946 में गठित संविधान सभा द्वारा किया गया, जिसने विश्व के विभिन्न संविधानों – ब्रिटेन (संसदीय प्रणाली), अमेरिका (मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन), आयरलैंड (नीति निर्देशक तत्त्व), कनाडा (संघीय ढाँचा) – से प्रेरणा ली। लेकिन भारतीय संविधान की विशेषताएं केवल ‘उधार’ नहीं हैं, बल्कि भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित हैं। 26 नवंबर 1949 को संविधान बना और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
अब वर्ष 2026 के संदर्भ में देखें – संविधान में अब तक 105 से अधिक संशोधन हो चुके हैं। 2025-26 में कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं: सर्वोच्च न्यायालय ने ‘इलेक्टोरल बॉन्ड योजना’ को रद्द करते हुए पारदर्शिता और मतदान के अधिकार की पुष्टि की (2025 की शुरुआत में), जो भारतीय संविधान की विशेषताओं में ‘नीति निर्देशक तत्त्वों’ एवं ‘मौलिक अधिकारों’ के अंतर्संबंध को दर्शाता है। इसके अलावा, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान की लचीली संशोधन प्रक्रिया ही भारत को बदलती वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता देती है। 2026 में भारत संविधान के 75 वर्ष पूरे कर चुका होगा (1950 से 2025 ? गणना: 2025 में 75 वर्ष; 2026 में 76वाँ वर्ष), लेकिन NITI Aayog 2026 रिपोर्ट के अनुसार ‘75 वर्ष - संविधान का भविष्य’ शीर्षक से चर्चा हुई, जिसमें संविधान की मूल विशेषताओं पर बहस छेड़ी गई।
विस्तृत व्याख्या
आइए अब भारतीय संविधान की विशेषताओं को बिंदुवार परंतु गहनता से समझते हैं। हर विशेषता को UPSC के दृष्टिकोण से उदाहरणों सहित पढ़ें।
1. लिखित एवं सबसे लंबा संविधान
भारतीय संविधान दुनिया के किसी भी संप्रभु देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है। मूल रूप से इसमें 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं; आज 2026 में 470+ अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हो चुकी हैं (संशोधनों के कारण)। ‘लिखित’ होने का अर्थ है कि इसके नियम स्पष्ट, दस्तावेजित और न्यायालयों में प्रवर्तनीय हैं। यह विशेषता भारत को ब्रिटेन (जहाँ अलिखित संविधान) से अलग करती है। UPSC में अक्सर तुलनात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं: “अलिखित संविधान की तुलना में लिखित संविधान के क्या लाभ हैं?”
2. संघीय ढाँचा पर उच्च एकात्मक प्रवृत्ति
यह भारतीय संविधान की सबसे अनोखी विशेषता है। संविधान में स्पष्ट रूप से संघीय विशेषताएँ (लिखित संविधान, दोहरी सरकार, विधियों का वितरण, स्वतंत्र न्यायपालिका) मौजूद हैं, लेकिन एकात्मक प्रवृत्तियाँ (एकल नागरिकता, सामान्य चुनाव आयोग, संशोधन में केंद्र का दबदबा, आपातकाल के दौरान राज्यों पर केंद्र नियंत्रण) इतनी प्रबल हैं कि डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इसे ‘अर्ध-संघीय’ या ‘संघीय-एकात्मक’ कहा। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के तहत केंद्र राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकता है। 2025-26 में ‘राज्यों का विशेषाधिकार’ और ‘केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध’ पर बहसें हो रही हैं – NITI Aayog की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि GST परिषद में राज्यों को अधिक मताधिकार दिया जाए, लेकिन यह प्रक्रिया स्वयं संविधान की एकात्मक प्रवृत्ति को समायोजित करती है।
3. संसदीय प्रणाली (वेस्टमिंस्टर मॉडल)
भारत का शासन ‘राष्ट्रपति’ (नाममात्र का प्रमुख) तथा ‘प्रधानमंत्री’ (वास्तविक कार्यकारी प्रमुख) के साथ संसदीय है। इस विशेषता में सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75), लोकसभा में बहुमत का समर्थन, राष्ट्रपति द्वारा विघटन की शक्ति शामिल है। 2025 के ‘प्रश्नकाल’ और ‘शून्यकाल’ में हुए व्यवधानों ने एक बार फिर संसदीय अनुशासन पर सवाल खड़े किए, परंतु संविधान की यह प्रणाली कार्यपालिका को विधायिका के प्रति जवाबदेह बनाती है। यूपीएससी परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है: “अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली से भारतीय संसदीय प्रणाली कैसे भिन्न है?”
4. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) – भाग III
अनुच्छेद 12 से 35 तक छह मूल अधिकार (समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार) दिए गए हैं। ये अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं। अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का विस्तार ‘जलवायु परिवर्तन से सुरक्षा’ तक कर दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि मौलिक अधिकारों की व्याख्या गतिशील है। कोई भी कानून जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट द्वारा रद्द किया जा सकता है (अनुच्छेद 32 व 226)। इसी कड़ी में ‘रिट’ (Writs) का ज्ञान भी UPSC के लिए अनिवार्य है।
5. नीति निर्देशक तत्त्व (DPSP) – भाग IV
अनुच्छेद 36 से 51 तक, ये राज्य को नीति बनाने के निर्देश हैं, लेकिन ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं (न्यायिक न होने के बावजूद, ये ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत’ कहलाते हैं)। हालाँकि 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया कि ग्राम स्वराज (अनुच्छेद 40), समान न्याय एवं मुफ्त विधिक सहायता (अनुच्छेद 39A), पर्यावरण संरक्षण (अनुच्छेद 48A) जैसे सिद्धांतों को नीतियों में शामिल किया जा रहा है। DPSP और मौलिक अधिकारों में टकराव के मामले में (जैसे केशवानंद भारती केस, मिनर्वा मिल्स केस) न्यायालय ने ‘मूल ढाँचा’ (Basic Structure) के सिद्धांत के तहत संतुलन बनाया है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका एवं न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review)
अनुच्छेद 124 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना का प्रावधान है। न्यायाधीशों की नियुक्ति (कॉलेजियम प्रणाली – जो हाल के वर्षों में विवादित रही) और उन्हें हटाने की कठिन प्रक्रिया (अनुच्छेद 124 (4) में महाभियोग) न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। न्यायिक पुनर्विलोकन के तहत सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध परीक्षण कर सकता है। यह संविधान की ‘मूल अभिलक्षण’ (Basic Feature) है। 2025 के ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ केस में सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश और चुनाव सुधार से जुड़ी केंद्र सरकार की योजना को रद्द कर यह सिद्ध किया कि न्यायिक पुनर्विलोकन मजबूत है।
7. एकल नागरिकता (Single Citizenship)
संघीय व्यवस्था के बावजूद भारत में एकल नागरिकता है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक भारतीय केवल भारत का नागरिक है, न कि पृथक राज्य का। यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करता है। 2026 तक, सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) 2019 पर बहसें तो हुईं, लेकिन एकल नागरिकता का सिद्धांत कायम है। अमेरिका में दोहरी नागरिकता संभव है, पर भारत में नहीं।
8. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)
अनुच्छेद 326 के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह एक बड़ा प्रयोग था। 2024 के लोकसभा चुनाव में 96 करोड़ से अधिक मतदाता थे – यह दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी अभ्यास है।
9. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions) – भाग XVIII
अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल), 356 (राज्य आपातकाल), 360 (वित्तीय आपातकाल) शक्तियाँ। आपातकाल के दौरान संविधान की संघीय विशेषताएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं और केंद्र अत्यधिक शक्तिशाली हो जाता है। 1975 के आपातकाल ने इस प्रावधान की आलोचना को जन्म दिया, लेकिन 44वें संशोधन (1978) के बाद इसे अधिक सुरक्षित बनाया गया (जैसे राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर ही आपातकाल घोषित करना)।
10. संशोधन प्रक्रिया (Amendment Procedure) – अनुच्छेद 368
न तो ब्रिटेन की तरह अत्यंत लचीली, न अमेरिका की तरह कठोर। भारत में संशोधन तीन प्रकार से होते हैं: (क) साधारण बहुमत (जैसे राज्यों की सीमा बदलना), (ख) विशेष बहुमत (संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3) और (ग) विशेष बहुमत + आधे राज्यों का अनुमोदन (जैसे राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े मामले)। 2025 में 106वाँ संशोधन (प्रस्तावित) ‘पंचायतों को अधिक वित्तीय अधिकार’ देने पर चर्चा में है। मूल ढाँचा सिद्धांत (केशवानंद भारती 1973) के अनुसार कोई संशोधन संविधान के ‘मूल ढाँचे’ को नष्ट नहीं कर सकता।
संरचना या प्रकार या घटक
भारतीय संविधान की विशेषताओं को तीन स्तरों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
स्त्रोत-आधारित विशेषताएँ – (अमेरिका से – मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन; ब्रिटेन से – संसदीय प्रणाली, कानून का शासन; कनाडा से – संघीय ढाँचा; आयरलैंड से – DPSP)
संरचनात्मक विशेषताएँ – (लिखित, लंबा, संघात्मक, सरकार का संसदीय स्वरूप, स्वतंत्र न्यायपालिका)
दार्शनिक विशेषताएँ – (प्रस्तावना – संप्रभुता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता)
UPSC अक्सर ‘प्रस्तावना’ में अंतर्निहित विशेषताओं पर प्रश्न पूछता है।
हालिया उदाहरण 2025-26
उदाहरण 1 (2025 का न्यायिक उदाहरण): 2025 की प्रारंभिक तिमाही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘इलेक्टोरल बॉन्ड योजना’ को अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और मतदाताओं के ‘जानने के अधिकार’ का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया। यह मामला भारतीय संविधान की विशेषताओं – न्यायिक पुनर्विलोकन और मौलिक अधिकारों की प्रभावशीलता – का जीता-जागता प्रमाण है।
उदाहरण 2 (संशोधन से जुड़ा): 2025 में ‘पश्चिम बंगाल राज्य बनाम केंद्र’ में मतभेद के बाद GST परिषद में वोटिंग अधिकारों को लेकर चर्चा हुई, लेकिन अनुच्छेद 279A के तहत संविधान की संघीय प्रकृति पर एकात्मक प्रभाव स्पष्ट दिखा।
उदाहरण 3 (हालिया – 2026 के लिए महत्वपूर्ण): प्रधानमंत्री द्वारा 2026 के बजट पूर्व भाषण में ‘उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए विशेष दर्जा’ की माँग को अनुच्छेद 371 (विशेष प्रावधान) के अंतर्गत रखा गया। यह संविधान की ‘लचीला संघवाद’ विशेषता को दर्शाता है, जहाँ कुछ राज्यों को विशिष्ट अधिकार दिए गए हैं।
UPSC PYQ
प्रश्न 1 (2019 Mains GS-II): “भारतीय संविधान के संघीय ढाँचे को ‘अर्ध-संघीय’ क्यों कहा जाता है? उदाहरण सहित समझाइए।”
व्याख्या: इस प्रश्न में अभ्यर्थी को एकात्मक प्रवृत्तियाँ (जैसे अनुच्छेद 356, 352, एकल नागरिकता) एवं संघीय विशेषताओं (विधायी सूची, स्वतंत्र न्यायपालिका) को समझना था। उत्तर में के. सी. व्हीयर और अम्बेडकर के दृष्टिकोण को भी जोड़ना चाहिए था।
प्रश्न 2 (2022 Prelims): “निम्नलिखित में से कौन सी विशेषता भारतीय संविधान में ब्रिटिश प्रभाव को दर्शाती है? (a) मौलिक अधिकार, (b) न्यायिक पुनर्विलोकन, (c) कानून का शासन, (d) संघीय व्यवस्था।”
उत्तर: c – कानून का शासन। मौलिक अधिकार अमेरिका से, न्यायिक पुनर्विलोकन अमेरिका से, संघीय व्यवस्था कनाडा से।
प्रश्न 3 (2024 Mains GS-II): “क्या भारतीय संविधान की मूल अभिलक्षणों (basic structure) की अवधारणा ने संशोधन शक्ति पर अंकुश लगा दिया है? विश्लेषण करें।”
व्याख्या: यह केशवानंद भारती (1973), मिनर्वा मिल्स (1980) केस से जुड़ा है। संविधान की विशेषता – मूल ढाँचा सिद्धांत – यह सुनिश्चित करता है कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है।
संभावित प्रश्न (2026 के लिए सुझाव):
“चर्चा करें कि भारतीय संविधान की विशेषताएं इसे एक ‘जीवंत दस्तावेज’ कैसे बनाती हैं? 2025-26 के उदाहरणों सहित व्याख्या करें।”
क्यों महत्वपूर्ण?
भारतीय संविधान की विशेषताओं का अध्ययन केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं बल्कि यह समझने के लिए है कि भारत जैसा विविध देश कैसे कार्य करता है। ये विशेषताएँ:
राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखती हैं (एकल नागरिकता, आपातकाल प्रावधान)
नागरिकों को अत्याचार से बचाती हैं (मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन)
सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का रास्ता दिखाती हैं (DPSP, समाजवादी स्वरूप)
विविधता में एकता सुनिश्चित करती हैं (धर्मनिरपेक्षता, सांस्कृतिक अधिकार)
शासन को जवाबदेह बनाती हैं (संसदीय प्रणाली)
UPSC के दृष्टिकोण से, प्रश्न अप्रत्यक्ष रूप से मूल अधिकारों, DPSP, न्यायपालिका के भूमिका, संघवाद के मुद्दों पर हर वर्ष पूछे जाते हैं। 2026 के चुनावों और नीतिगत बदलावों को समझने के लिए इन विशेषताओं का अद्यतन ज्ञान अनिवार्य है।
चुनौतियां
वर्तमान में भारतीय संविधान के क्रियान्वयन में निम्नलिखित चुनौतियाँ हैं:
केंद्र-राज्य संबंधों में बढ़ता तनाव – विशेषकर वित्तीय संसाधन बँटवारे और राज्यपाल की भूमिका को लेकर। 2025 में तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्यों ने केंद्र के कुछ अध्यादेशों को चुनौती दी।
न्यायपालिका में केसों का बोझ – लगभग 5 करोड़ मामले लंबित होना न्यायिक पुनर्विलोकन की प्रभावशीलता पर प्रश्न चिह्न है।
मौलिक अधिकारों का हनन – कई बार सुरक्षा कानूनों (जैसे UAPA) के दुरुपयोग की शिकायतें मिलती हैं।
संशोधन प्रक्रिया का राजनीतिकरण – कभी-कभी बहुमत का दुरुपयोग कर मूल ढाँचे को कमजोर करने के प्रयास होते हैं।
धर्मनिरपेक्षता बनाम पहचान की राजनीति – 2025 में न्यायिक टिप्पणियों के बाद भी यह संवैधानिक विशेषता दबाव में दिखती है।
आगे का रास्ता
इन चुनौतियों से निपटने के लिए निम्नलिखित सुझाव हैं:
केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार – दूसरे विधि आयोग (2025 रिपोर्ट) के अनुसार, राज्य सूची की कुछ विषयों को समवर्ती सूची में ले जाना और राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य सरकारों की सहमति आवश्यक है।
न्यायिक सुधार – नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन (NJC) के पुनः गठन पर बहस, न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात बढ़ाना (अभी प्रति 10 लाख पर 20 न्यायाधीश, जबकि विश्व औसत 50)।
संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा – स्कूली पाठ्यक्रम से लेकर सिविल सेवा प्रशिक्षण में मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) पर जोर।
ई-संसद और प्रौद्योगिकी का उपयोग – 2026 तक संसद की कार्यवाही को AI-आधारित वास्तविक समय ट्रांसक्रिप्ट से पारदर्शी बनाना।
समय-समय पर संविधान का समीक्षा – ‘संविधान जीर्णोद्धार समिति’ (जैसा कि नीति आयोग 2025 में सुझाया) – हर 25 वर्ष में विशेषज्ञ समीक्षा।
सारांशप्रिय छात्र, भारतीय संविधान की विशेषताएं केवल रटने की सूची नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं। इस लेख से हमने निष्कर्ष निकाला कि:
भारतीय संविधान एक लिखित, लंबा, संघीय-एकात्मक दस्तावेज है।
संसदीय प्रणाली, मौलिक अधिकार, DPSP, स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक पुनर्विलोकन प्रमुख विशेषताएँ हैं।
एकल नागरिकता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, आपातकालीन प्रावधान और संशोधन की लचीली प्रक्रिया इसे अद्वितीय बनाते हैं।
2025-26 के न्यायिक निर्णयों एवं राजनीतिक घटनाओं ने इन विशेषताओं को पुनः परिभाषित किया है।
UPSC 2026 के लिए आपको ‘मूल ढाँचा’ सिद्धांत, हालिया संशोधनों (103वाँ, 105वाँ) और ताज़ा फैसलों (इलेक्टोरल बॉन्ड, शबाना फातिमा केस) पर विशेष ध्यान देना है।
याद रखें – यह विषय पूरे GS-II की रीढ़ है। संविधान की हर विशेषता का एक ‘कारण’ और ‘प्रभाव’ होता है, उसे समझें। शुभकामनाएँ।
Short Revision Points (5-7 Key Points)भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है (अब 25 भाग, 12 अनुसूचियाँ, 470+ अनुच्छेद)।
यह संसदीय प्रणाली पर आधारित है – राष्ट्रपति सांकेतिक, प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख।
संघीय ढाँचा लेकिन एकात्मक प्रवृत्ति (अर्ध-संघीय) – आपातकाल में केंद्र का दबदबा।
मौलिक अधिकार (भाग III) न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं, जबकि DPSP (भाग IV) अप्रवर्तनीय किन्तु नीति-निर्देशक।
स्वतंत्र न्यायपालिका न्यायिक पुनर्विलोकन एवं रिट शक्तियों से सुसज्जित है।
संशोधन प्रक्रिया लचीली और कठोर के मध्य संतुलित है, पर मूल ढाँचा सुरक्षित है।
एकल नागरिकता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवादी प्रस्तावना इसकी अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं।
FAQs
प्रश्न 1: क्या भारतीय संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘धर्म निरपेक्ष’ शब्द शुरू से थे?
उत्तर: नहीं, ये शब्द 42वें संशोधन (1976) द्वारा प्रस्तावना में जोड़े गए। पर यह विशेषता संविधान के अन्य भागों में पहले से विद्यमान थी।प्रश्न 2: ‘न्यायिक पुनर्विलोकन’ और ‘मूल ढाँचा सिद्धांत’ में क्या अंतर है?
उत्तर: न्यायिक पुनर्विलोकन कोर्ट द्वारा कानूनों की संवैधानिकता जाँच है, जबकि मूल ढाँचा सिद्धांत यह कहता है कि संसद संविधान के मूल ढाँचे को संशोधन द्वारा भी नहीं बदल सकती। केशवानंद भारती केस से यह विशेषता विकसित हुई।प्रश्न 3: UPSC Mains के लिए किन विशेषताओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए?
उत्तर: संघवाद (केंद्र-राज्य), आपातकाल प्रावधान, मौलिक अधिकारों का आपातकाल में निलंबन, संशोधन प्रक्रिया, DPSP और मूल अधिकारों का अंतर्संबंध, और न्यायपालिका की भूमिका – इन पर गहरी पकड़ बनाएँ।प्रश्न 4: क्या आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं?
उत्तर: अनुच्छेद 359 के अनुसार राष्ट्रीय आपातकाल में राष्ट्रपति मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित कर सकते हैं, लेकिन अनुच्छेद 20-21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं दोषसिद्धि से संरक्षण) कभी निलंबित नहीं होते। यह 44वें संशोधन की देन है।प्रश्न 5: 2025-26 के किसी एक संवैधानिक मुद्दे का उल्लेख करें जो UPSC के लिए प्रासंगिक है।
उत्तर: ‘राज्यपाल द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने में देरी’ – सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में स्पष्ट किया कि राज्यपाल संविधान की मूल विशेषताओं (सरकार की संसदीय प्रणाली) के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकते।
Author Details
Author Name: Md Afjal Ansari
Experience: 4 plus years UPSC Aspirant
Optional Subject: Public Administration
लेखक UPSC की तैयारी कर रहे हैं और उन्हें हिंदी माध्यम के छात्रों की समस्याओं का गहरा अनुभव है। यह लेख NCERT, लक्ष्मीकांत, नवीनतम सुप्रीम कोर्ट निर्णयों एवं सरकारी रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है।
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